तरबूज की खेती की जानकारी : अनुपयोगी भूमि पर कम समय में कमाएं ज्यादा मुनाफा

तरबूज की खेती की जानकारी

तरबूज की उन्नत खेती : सही समय पर तरबूज की बुवाई देगी अधिक मुनाफा

अगर आप कम समय, कम लागत और कम पानी में खेती करके ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं तो आप तरबूज की खेती कर सकते हैं। 90-100 दिनों में तैयार होने वाली तरबूज की खेती एक एकड़ भूमि में करीब एक लाख रुपए का मुनाफा देती है। किसान भाई अपनी अनुपयोगी रेतीली भूमि में तजबूत की खेती करके कमाई कर सकते हैं। देश के राजस्थान, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में तरबूज की खेती होती है। तरबूज का वैज्ञानिक नाम सिटीलुस लैनाटस है और यह जायद मौसम की प्रमुख फसल है। ट्रैक्टरफर्स्ट की इस पोस्ट में आपको तरबूज की खेती की संपूर्ण जानकारी दी जा रही है।

तरबूज की खेती के लिए भूमि और जलवायु 

तरबूज की खेती के लिए भूमि और जलवायु

तरबूज की उन्नत खेती के लिए रेतीली और रेतीली दोमट मिट्टी सबसे अच्छी रहती है। मिट्टी का पी.एच. मान 6 से 7 होना चाहिए। नदियों के खाली स्थानों में तरबूज की खेती से रिकॉर्ड उत्पादन मिलता है। तरबूज की खेती में अधिक तापमान वाली जलवायु सबसे श्रेष्ठ रहती है। गर्म और शुष्क जलवायु में तरबूज के पौधों की अच्छी वृद्धि होती है। इसके पौधे के जमाव और बढ़वार के समय लगभग 22 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान अच्छा रहता है। ठंडी और पाले वाली जलवायु में तरबूत की खेती नहीं करना चाहिए। नमी वाली जलवायु में तरबूज की खेती करने से बचना चाहिए। नमी के कारण पत्तियों में बीमारी आने लगती है।

तरबूज रोपण का सही समय / तरबूज की खेती का समय

गर्मी के मौसम में पैदा होने वाले तरबूज का फल मीठा होता है। अगर आपको मीठे फल चाहिए तो तरबूज की बुवाई/रोपण जनवरी व फरवरी माह में करना होगी। खरीफ सीजन में तरबूज की फसल लेने के लिए जून-जुलाई में बुवाई करनी चाहिए। तरबूज की खेती के लिए गर्म व शुष्क जलवायु उचित मानी जाती है। फल की वृद्धि के दौरान गर्म दिन 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान और ठंडी रात अच्छी मानी जाती है क्योंकि ऐसे मौसम में फल मीठा होता है।

तरबूज की खेती के लिए भूमि की तैयारी

तरबूज की खेती के लिए भूमि की तैयारी

तरबूज की फसल के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना आवश्यक है। बुवाई से पहले खेत की जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। खेत की जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से कर सकते हैं। खेती की गहरी जुताई के समय अच्छी तरह से विघटित गोबर या कम्पोस्ट खाद 15-20 टन प्रति हैक्टर मृदा में देनी चाहिए।

तरबूज की खेती में बीज दर और बीजोपचार

तरबूज की उन्नत किस्मों के लिए बीजदर 2.5-3 किलोग्राम प्रति हैक्टर उचित होती है जबकि संकर किस्मों के लिए 750-875 ग्राम प्रति हैक्टर पर्याप्त होती है। खेत में बीज की बुआई के पहले बीज को कार्बेन्डाजिम फफूंदनाशक 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में लगभग तीन घंटे तक डुबोकर उपचारित करना चाहिए। इसके बाद उपचारित बीजों को नम जूट बैग में 12 घंटे तक छाया में रखना चाहिए। इसके बाद खेत में बुवाई की जा सकती है।

बुआई/रोपण की वैज्ञानिक विधि

बुआई/रोपण की वैज्ञानिक विधि

सामान्यत: तरबूज की बुवाई गड्ढ़ों में की जाती है। बुवाई के लिए उथला गड्ढा विधि और गहरा गड्ढा विधि प्रचलित है। इसके अलावा अन्य विधि भी प्रचलित है। यहां आपको प्रचलित विधियों की जानकारी दी जा रही है।

  • उथला गड्ढा विधि

इस विधि में 60 सेमी व्यास के 45 सेमी गहरे गड्ढे खोदे जाते हैं। गड्ढे से गड्ढे की दूरी 1.5 मीटर से 2.5 मीटर रखते हैं। गड्ढो को एक सप्ताह तक खुला छोड़ा जाता है। इसके बाद खाद व उर्वरक मिलाकर गड्ढ़ों को भर देते हैं। इस विधि में अब वृहताकार थाल बनाकर 2-2.4 सेमी गहरे तीन-चार बीज प्रति थाल बुवाई करके बारिक मिट्टी या गोबर की खाद से ढक देते हैं। अंकुरण होने के बाद प्रति थाल दो पौधे छोडक़र बाकि पौधे उखाड़ लेते हैं।

  • गहरा गड्ढा विधि

नदी के किनारों पर तरबूज की खेती करने के लिए यह विधि अपनाई जाती है। इस विधि में 60.75 सेमी व्यास के 1.15 मीटर की दूरी पर गड्ढे बनाए जाते हैं। 2 मीटर चौड़ी तथा जमीन से उठी हुई पट्टियां बनाकर उसके किनारे पर 1.15 मीटर की दूरी पर बीज बोते हैं। इसमें जमीन से 30 से 40 सेमी की गहराई तक मृदा, खाद एवं उवर्रक का मिश्रण भरा जाता है। शेष क्रिया उथला गड्ढा विधि के अनुसार अपनाई जाती है।

  • मल्चिंग पेपर विधि में बुवाई

तरबूज की बुवाई के लिए मल्चिंग पेपर विधि भी प्रचलित है। इस विधि में भूमि की तैयारी के बाद 60 सेमी चौड़ाई और 15-20 सेमी ऊंचाई वाली क्यारियां ‘रेज्ड बेड’ तैयार की जाती हैं। क्यारियों में 6 फीट का अंतर उचित है। क्यारियों पर बीचों-बीच में लेटरल्स फैलाने चाहिए। क्यारियों को 4 फीट चौड़ाई के 25-30 माइक्रॉन मोटे मल्चिंग पेपर से कसकर फैलाना चाहिए। क्यारियों पर कसकर फैले मल्चिंग पेपर में बुआई/रोपण के कम से कम एक दिन पहले 30-45 सेमी की दूरियों पर छेद कर लेना चाहिए। इससे मृदा की गर्म हवा को बाहर निकाल सकते हैं। बुवाई से पहले क्यारियों की सिंचाई करनी चाहिए। प्रोट्रे में कोकोपीट का उपयोग करके 15-21 दिनों की आयु के पौधों का रोपण करें। मल्चिंग विधि का फायदा यह है कि इसमें सिंचाई के लिए पानी की कम आवश्यकता पड़ती है।

तरबूज की खेती में सिंचाई प्रबंधन

तरबूज की फसल पानी की जरूरत के प्रति संवेदनशील होती है। इसलिए समय-समय पर सिंचाई की आवश्यकता होती है। तरबूज के बीज रोपण का काम सुबह या शाम के लिए किया जाना चाहिए। इसके तुरंत बाद आधा घंटा तक टपकन पद्धति से सिंचाई करनी चाहिए। मृदा प्रकार अथवा जलवायु के अनुसार पहले छह दिन सिंचाई करनी चाहिए। कृषि विशेषज्ञ प्रतिदिन 10 मिनट सिंचाई की सलाह देते हैं। शेष सिंचाई प्रबंधन फसल वृद्धि और विकास के अनुसार करनी चाहिए। तरबूज की फसल को प्रारंभिक स्थिति में पानी की कम जरूरत होती है। लेकिन पौधों की वृद्धि के अनुसार पानी की जरुरत बढ़ जाती है। यहां, प्रारंभिक स्थिति में सिंचाई पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है। प्रारंभिक चरण में पानी की आवश्यकता कम होती है। धीरे-धीरे पौधे की वृद्धि और विकास के अनुसार पानी की आवश्यकता बढ़ जाती है। यदि प्रारंभिक अवस्था में पानी अधिक हो जाता है तो अंकुरण, रोपाई की वृद्धि और कीट एवं रोग संक्रमण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। जल प्रबंधन मृदा के प्रकार और फसल के विकास पर निर्भर करता है। सामान्यत: 5-6 दिन के अंतराल पर पानी देना चाहिए। सुबह 9 बजे से पहले सिंचाई करनी चाहिए। अनियमित सिंचाई से फलों का फटना, विकृत आकार जैसी समस्याएं सामने आती हैं। सामान्यत: तरबूज की खेती में ड्रिप सिंचाई पद्धति का प्रयोग किया जाता है।

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

  • तरबूज की खेती में मृदा जांच के आधार पर ही खाद और उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए।
    अच्छी तरह से विघटित गोबर या कंपोस्ट खाद 15-20 टन प्रति हैक्टर खेत तैयार करने समय मृदा में देनी चाहिए।
  • तरबूज की फसल के लिए रासायनिक उर्वरक के रूप में प्रति हैक्टर 50 किग्रा नाइट्रोजन, 109 किग्रा यूरिया, 50 किग्रा फॉस्फोरस, 313 किग्राम एसएसपी, 50 किग्रा पोटाश, 83 किग्राम एमओपी बुवाई/रोपण के समय दिया जाना चाहिए।
  • रासायनिक उर्वरक प्रयोग से लगभग 10वें दिन बाद जैविक उर्वरक एजोटोबॅक्टर 5 किग्रा, पीएसबी 5 किग्रा और ट्राइकोडर्मा 5 किग्रा प्रति हैक्टर देना उचित माना जाता है।
  • नीम खली (नीम केक) 250 किलोग्राम प्रति हैक्टर दे सकते हैं।
  • पानी में घुलनशील जैव उर्वरक टपकन सिंचाई से भी दे सकते हैं। जैव उर्वरक का रासायनिक उर्वरक के साथ प्रयोग न करें।
  • शेष नाइट्रोजन की मात्रा 50 किग्रा, यूरिया 109 किग्रा को बुवाई के 30, 45 एवं 60 दिनों में समान भाग में देना चाहिए।
  • खाद का उपयोग मृदा में उपस्थित आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता एवं मृदा परीक्षण के ऊपर निर्भर रहता है।

तरबूज की खेती में खरपतवार नियंत्रण

तरबूज की खेती में खरपतवार के कारण बेल की वृद्धि रुक जाती है। जब पौधे छोटे हों, उस समय दो बार खेत की गुड़ाई करनी चाहिए और खरपतवार को निकाल देना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण के लिए एलाक्लोजर 50 ईसी 2 लीटर सक्रिय तत्व एक हेक्टेयर भूमि में या ब्यूटाक्लोस 50 ईसी 2 सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के बाद या अंकुरण से पूर्व छिडक़ाव कर मृदा में मिला दें। छिडक़ाव के लिए 500 लीटर पानी एवं फ्लैट नोजर का उपयोग करना चाहिए।

तरबूज उगाने की विधियां

तरबूज उगाने की विधियां

तरबूज को 3 विधियों से उगाया जा सकता है:

1. बीज से तरबूज को उगाना
2. नॉन ग्राफ्टेड पौधों से उगाना
3. ग्राफ्टेड पौधों से उगाना

यहां आपको तीनों विधियों की जानकारी दी जा रही है।

बीज से तरबूज को उगाना : बीज से तरबूज की फसल लेने के लिए पहले बीज को मिट्टी में अंकुरित किया जाता है। इस समय मिट्टी का तापमान 18 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। बीज को अंकुरित करने के लिए नमी का स्तर अच्छा होना चाहिए। अधिक सिंचाई से हानि की संभावना है। मौसम और मिट्टी की स्थितियों के आधार पर तरबूज के बीज 6-10 दिन में आसानी से अंकुरित हो जाते हैं।

नॉन ग्राफ्टेड पौधों से तरबूज उगाना : नॉन ग्राफ्टेड पौधों से तरबूज उगाने की विधि सामान्य तौर पर प्रचलित है। इस विधि में खेत में उगाने वाली किस्म का विशेष ध्यान रखा जाता है। ऐसी किस्म का चयन किया जाता है जो बीमारियों, कीड़ों, मिट्टी का कम या ज्यादा पीएम मान, लवणता के स्तर आदि को सहन कर सके। इन किस्मों में चाल्र्सटन ग्रे, क्रिमसन स्वीट, जुबली, ऑल स्वीट, रॉयल स्वीट, संगरिया, ट्रिपलोइड सीडलेस और ब्लैक डायमंड।

ग्राफ्टेड पौधों से तरबूज उगाना : खेती में नवाचार अपनाने वाले किसान ग्राफ्टेड पौधों से तजबूज की खेती करना पंसद कर रहे हैं। ग्राफ्टिंग एक सामान्य तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक है। जिसमें दो अलग-अलग पौधों के भागों को जोड़ा जाता है। इससे उनका एक पौधे के रूप में विकास होता है। पेड़ के ऊपरी हिस्सों को साइअन और निचले हिस्से को रूटस्टॉक कहा जाता है। वर्तमान समय में, स्क्वैश के रूटस्टॉक पर ग्राफ्ट किए गए तरबूज के साइअन का सबसे ज्यादा प्रचलन है।

तरबूज की खेती में रोग और कीट प्रकोप

तरबूज की फसल को कई रोगों, बीमारियों और कीटों के प्रकोप से नुकसान हो सकता है। इसलिए हमेशा प्रमाणित और बीमारी रहित बीज और पौधों का रोपण खेत में करना चाहिए। यहां आपको तरबूज की खेती में कीड़े और बीमारियों के बारे में जानकारी दी जा रही है।

थ्रिप्स : थ्रिप्स पल्मी कीड़ों का आकार पतला होता है। ये पत्तियों का रस चूसकर तरबूज की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। धूप और गर्म मौसम इनका सहयोगी होती है। कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार थ्रिप्स पर नियंत्रण करना चाहिए।

एफिड्स : एफिड्स कीड़े कई वायरस रोगों का फैलाव करते हैं। ये पौधों का रस चूसकर उन्हें कमजोर बनाते हैं। इस कीड़े का प्रकोप होने पर पत्तियां मुडक़र सिकुडऩे लगती है।

एन्थ्रेक्नोज : यह बीमारी पत्तियों और लताओं को नुकसान पहुंचाती है। इस बीमारी में पुराने पत्तों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और तना, फूल और फलों को नुकसान पहुंचता है। यह बीमारी कलेटोट्रीचम लगेनरियम के कारण होती है। आपको बता दें कि ठंडा और गीला मौसम फफूंदी के बीजाणुओं के अनुकूल है जबकि सूखा और गर्म मौसम बीमारी के चक्र को रोकता है।

कोमल फफूंदी : इस रोग के लक्षण बारिश के बाद या बसंत ऋतु के दौरान पत्तियों पर दिखाई देते हैं। इस रोग का संक्रमण होने पर कोमल पत्तों पर हल्के पीले या भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। यह रोग कोमल फफूंदी पेरोनोस्पोरा या प्लास्मोपारा जीनस के सूक्ष्मजीवों के कारण होता है।

पाउडरी फफूंदी : इस रोग में पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी फफूंदी दिखाई देती है। पाउडरी फफूंदी रोग के फैलने पर पत्तियां भूरे रंग की हो जाती है और गिर जाती है। पाउडर फफूंदी में एरीसिपल्स और पोडोस्फेरा जैथी सबसे आम है।

तरबूज की उन्नत किस्में 

तरबूज की उन्नत किस्में 

तरबूज की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए किसानों को मिट्टी और मौसम के अनुसार उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिए। यहां कुछ उन्नत किस्मों की जानकारी दी गई है।

शुगर बेवी : इस किस्म में फल का छिलका ऊपर से गहरे हरे रंग की हल्की धारियां लिए होता है। गूदा गहरा लाल तथा मीठा होता है। बीज छोटे होते हैं। फल का वजन 2 से 3 किलो होता है। यह किस्म 95-100 दिनों में तैयार होती है।

अर्का ज्योति : इस किस्म के तरबूज का वजन 4 से 6 किलो होता है। फल गोल, हरी धारी युक्त होते हैं।

दुर्गापुर मीठा : फल हराधारी युक्त होता है और गूदा रवेदार व स्वादिष्ट होता है। फल का वजन 6 से 8 किलो होता
है।

आसाही-पामाटो : इस किस्म के फल मध्यम आकार के होते हैं और वजन 6 से 8 किलोग्राम होता है। फल का छिलका हल्का हरा होता है और गूदा लाल तथा मीठा होता है। फल के बीज बेहद छोटे होते हैं।

न्यू हेम्पसाइन मिडगेट : गृह वाटिका के लिए यह किस्म सबसे ज्यादा प्रचलित है। इसके फल 2 से 3 किलोग्राम के होते हैं। इस किस्म के पौधे में फल अधिक आते हैं। गूदा लाल व मीठा होता है। छिलका हल्का हरा काली धारियों के साथ होता है।

तरबूज की खेती में फल तोडऩे की विधि

तरबूज की खेती में फल 90 से 100 दिन की अवधि में तैयार हो जाते हैं। फलों को यदि दूसरे राज्यों में दूर भेजना है तो पहले ही तोडऩा चाहिए। फलों को डंठल से अलग करने के लिए तेज धार वाले चाकू का उपयोग करना चाहिए। फलों को दबाकर भी कच्चे व पके होने का पता लगाया जा सकता है।

तरबूज का भंडारण व उपज

तरबूज को तोडऩे के बाद 2 से 3 सप्ताह तक आराम से रखा जा सकता है। फलों को उठाने व रखने में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। थोड़ी सी लापरवाही से फल का टूटकर नुकसान हो सकता है। अगर तरबूज की पैदावार की बात करें तो यह किस्मों पर निर्भर करती है। अलग-अलग किस्मों के अनुसार उत्पादन निर्धारित होता है। सामान्यत: एक हेक्टेयर में तरबूज की पैदावार 800 से 1000 क्विंटल आंकी जाती है। इस प्रकार किसान भाई तरबूज की खेती से अच्छी आमदनी कमा सकते हैं।

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